Translate

Showing posts with label Editor Voice. Show all posts
Showing posts with label Editor Voice. Show all posts

Thursday, April 28, 2016

Creative Space New Issue Published

Creative Space : International Journal
(Refereed & Peer-Reviewed Intrnational Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
Impact Factor : 0.339

Vol. 04, Issue 01, Jan. to Feb., 2016

New Issue Published Please Read and Download 
Chief Editor

Dr. Haresh Parmar
Research Associate
CDLA, New Delhi
Mo. 09408110030 and 09716104937

Guest Editor
Anil Khavdu and Dr. Bharat Bheda
Mo. 9978230599

Cover Page Image by 
Roseliz Francis (London)


English 
The Marginalised Subverting the Centre in Amitav Ghosh’s
‘The Calcutta Chromosome’
Sandeep A. Wagh
Current Trends of Community Mental Health in Psychiatrically ill Patients
Mr. Baku Davayat D.
Caste and Caste Discrimination in Dalit Literature:
A Special Reference to ‘Murdaiah’ and ‘The Out Caste’
Rajvir Singh
A Study of Achievement Motivation of Students of Higher Secondary
Chitroda Jasvanti Laljibhai
A Study of Self – Concept and Adjustment Among Students
 Raval Janki B.
Social Intelligence and Adjustment in Young Male and Female
Jayesh M. Chauhan
Psychological Well-Being and Social Support among  Married and Unmarried Women
Kinjal P. Usadadiya
Conceptual Analysis of Cyber Crime Up to Security and there Prevention
Hetal Bhatt
Commission, Function and Powers
Dr. Neetu Simar
Rajesh Kumar
A Critical Review of Sugam Babu’s Wings
Dr. Sapna Miranda
A Case Study of NPA in SBI
Dr. Anju Sondarva

Hindi 
भाषा : मानव अस्तित्व का प्रश्न
डॉ. नमस्या
समकालीन हिन्दी उपन्यासों में दलित चेतना
डॉ. जालिंदर इंगले
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 : एक अध्ययन
अनिल कुमार
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की विवेचना एवं प्रसंगिकता
सुभाष कुमार
किरातार्जुनीयम् में वर्णित शिव स्वरूप में पुरुषार्थ चतुष्टय का विनियोग
डॉ. भरतकुमार डी. परमार
साम्प्रत समय में कबीर के विचारों की प्रासंगिकता
डॉ. धर्मिष्ठा पी. मकवाणा

Gujarati
અનુભવ અને અનુભૂતિના લેખક જોજેફ મેકવાન
પ્રા. ડૉ. દિનુ ચૂડાસમા
ભારતમાં બાળકલ્યાણની સેવાઓ આપતી સંસ્થાઓ
પ્રો. ભાનુબેન.પી. ધામેચા
પરમાર્થની પ્રેરણામૂર્તિ : રામબાઈમાં
પ્રા. ડૉ. કે. જે. વાળા સુલભેશા
ભારતમાં બાળકલ્યાણી કલ્યાણ અને કુટુંબ કલ્યાણની સેવાઓ આપતી સંસ્થા-વોઉશનલ ગાઇડન્સ
પ્રા. મૈથીલીબેન પાઠક
ગીતામાં જ્ઞાનયોગ
લુવાર કિશોર જી.
વાલ્મીકિ રામાયણ અને સંસ્કૃત નાટકોમાં રામ
કોમલ ભટ્ટ
કિરાતાર્જુનીયમ મહાકાવ્યમાં શિવતત્ત્વ
ડામોર કિરણભાઈ એસ.
ગ્રામ્ય અને શહેરી સ્ત્રી પુરુષોમાં જ્ઞાતિપૂર્વગ્રહનો મનોવૈજ્ઞાનિક અભ્યાસ
શ્રીવાસ્તવ રીટા .  
ક્રૂષિક્ષેત્રે હરિયાળી રેલાવતી વોટરશેડ યોજના
નેહા ડી. થાનકી
પારિવારિક હિંસામાં સ્ર્તીઓને મળતા અધિકારો અને ફરજો
પૂજાબેન જોશી
]=w¥m\ કૃતિ સમીક્ષા
 પ્રા. સીતાબેન એસ. પટેલ
Others 
Present Scenario of Bandhani Craft in Jamnagar City
Prof. Manisha N. Khakhar
Dr. Veena S. Samani
Social History of Tashkent-Delhi relation: A Travel Account
Jayashree  Ambewadikar
Morality and Fashion among
Working and Non-Working Women
Sangeeta K. Rathod
 ‘दाईऔरछौआ माँदलित कहानी में दलित नारी: एक तुलनात्मक अध्ययन
डॉ. हरेश परमार
સહકારી નાણાપ્રબંધ (ત્રીસ્તરીય માળખું)
Dr. Sherathia Prabhavanti G.
સુરેન્દ્રનગર જીલ્લામાં ‘સરદાર સરોવર નર્મદા યોજના’
રાણા લગ્ધીરસિંહ કનકસિંહ
महाभारतस्य युद्धे कर्णस्य भूमिका
प्रा. तेजल जे. वसावा

Harish Mahuvakar Poems 

Send Your Article and Creative Writing 
creativespaceip@gmail.com 

Friday, April 1, 2016

Editor Voice CSIJ Vol 04, Issue 01 2016

Creative Space : International Journal
(Refereed & Peer-Reviewed Intrnational Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
Impact Factor : 0.339

Vol. 04, Issue 01, Jan. to Feb., 2016 

Editor Voice

Creative Space का प्रस्तुत अंक के साथ 4 साल सफलतम पुरे कर लिए है | आप सभी का धन्यवाद |
हमें आगे बढ़ना है, हमें कुछ कर दिखाना है, हम में वह ज़ज्बा है हो हर इन्सान में होता है, कुछ कर गुजरने का | हमें अपने बलबूते पर यानी आप सभी के साथ आगे बढ़ना है | हम लगातार बेहतर करने की कोशिष कर रहे है एवं उनमें कई प्रकार की कठिनाइयाँ भी आ रही है | हमारे मेम्बर सारे आपके बेहतर भविष्य के साथ आपका यह मंच भी बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है एवं मेहनत करते है | पर अभी भी हमारा संघर्ष जारी है | हम कई लेखकों को सामाजिक प्रतिबद्धता के चलते आप के सहयोग से उन्हें सहयोग करते है | यह भावना ही हमें बेहतर बनाने एवं बेहतर मंच प्रदान करने की प्रेरणा है |
नए लेखक हमारे साथ जुड़े है एवं जुड़ते रहे है, कई पत्र-पत्रिकाओं के बीच हमारा काम लगातार बढ़ रहा है | हर रोज हमें चुनौतियों का सामना करना पड़ता है | पर आपके साथ एवं सहयोग से हम एवं आप आगे बढ़ रहे है | इन चौथे साल में प्रवेश के समय हमने दो विशेषांक निकाले है तो साथ में हमने कई अंकों को विशेषरूप से संभाल के रख सके ऐसा रूप दिया गया है | आप की प्रगति में ही हमारी ख़ुशी है |
फिलहाल दिल्ली से आपके साथ बातचीत होती है, कई बार आप को नेटवर्क की वजह से परेशानी उठानी पड़ती होगी, आपका हर काम एवं हर बात को हम गंभीर रूप से लेते है एवं हर संभव समय में उसे पूरा करने के लिए कोशिश करते है | आपके सम्पर्क एवं बातचीत में नेटवर्क रूपी अवरोध के कारण हम आपसे धैर्य की बिनती करते है | हो सके तो आप मेल भी करें जिससे आपको मेल के माध्यम से सही जानकारी भी मिल जाये एवं आपके अकादेमिक अनुभव एवं भविष्य को बेहतर बना सके |
 वर्तमान परिदृश्य में जहाँ फेलोशिप बंद होती जा रही है वही फ़ीस भी बढ़ रही है | कई संस्थान निजी रूप से संचालित हो रहे है तो कई सरकारी संस्थान बंद करने की बात भी उठ रही है | शिक्षा संस्थाओं का निजीकरण एवं शिक्षा संस्थाओं को बंद करना-करवाना हमें फिर से उस युग में खड़ा कर देगी, जहाँ पर असमानता पग-पग हमें ठेंच पहुंचाती है | हमें देश को बौद्धिक रूप से सशक्त देखना है तो हमें वैज्ञानिक सोच को अपनाना होगा जो संविधान में हम नागरिक की मूल भावना में समाहित है | वैज्ञानिक विचार ही आपके मन एवं विचार को तथ्य को समझने एवं यथार्थ को जानने के लिये दृष्टि देता है |
यहाँ पर कई लोग पैसे से अमीर है, दिल से गरीब, यह वाकया किसी के साथ भी घटित हो सकता है | यही समय है हमें हमारी पहचान को पाने कि, की हम क्यों अमीर को अमीर होते एवं गरीब की ज्यादा गरीब होते हुए देखें | हम एक राष्ट्र की बात करते है पर समानता की जगह समरसता को रखते है, जो सरासर भ्रामक ख़याल एवं यथार्थ से परे है | आज भी हम उन बातों में उलझे है जहाँ पर एक ही बात कौन बोलता है उस पर निर्भर हो जाती है की वह बात गलत है या सही | अमीर, सत्ता से लिप्त एवं सत्ता समर्थक बोल को हमेशा सही माना जाना एवं सत्ता से परे यथार्थ बात रखना सत्ता के विरुद्ध माना जाना हमारे लोकतंत्र पर खतरा है |
अंत में हमारे उच्च शिक्षा में असमानता के चलते जब कोई आत्महत्या होती है, तो हमें यह समझना होगा की न्याय उनके लिए सबसे ज्यादा जरुरी है, अगर उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो संभव है जो लोग ऐसी विभेदकारी एवं शोषणकारी प्रवृत्ति में लिप्त है उनका हौशला बढ़ेगा एवं जो न्याय के पक्ष में है उनका संघर्ष और संघर्षमय हो जायेगा | उच्च शिक्षा में ऐसी घटनाएँ हमें हमारे शिक्षा तंत्र पर सवाल खड़ा करती है की आखिर हम रोजगारपरक शिक्षा दे के उन्हें बेरोजगार बना रहे है साथ में उनके विचारों का हनन भी कर रहे है | हमारे बेहतर भविष्य के लिए हमारा साझा प्रयास हमें बेहतर स्थिति में ला सकता है |  
हम प्रतिबद्धता के साथ आपके सहयोग से आगे बढ़ रहे है, हम आप सभी को धन्यवाद करते है | यह अंक आपके सामने रखते हुए, भविष्य में आपके सहयोग की अपेक्षा के साथ....
धन्यवाद |
                                                                                                                

डॉ. हरेश परमार

Tuesday, December 1, 2015

Editor Voice Vol. 3, Issue 05, 2015

Creative Space : International Journal
(Refereed & Peer-Reviewed Intrnational Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
Impact Factor : 0.339

Sept. to Oct., 2015 

Editor Voice

Creative Space का प्रस्तुत अंक आपके सामने आपके माध्यम से कई ऊँचाईयाँ छू रहा है | आपके प्रयासों से ही हम निच्चित समय में कार्य कर पा रहे है एवं आपके सामने तीसरे साल के पांचवे अंक को प्रस्तुत कर रहे है | आप सभी का सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापन करते है |
विगत 10 सालों से शिक्षा से जुड़े दावे एवं प्रयोग गंभीर रूप से राज्य एवं देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है | यह मानते है की, जिन लोगो को सरकारी नौकरी मिल जाती है वह बिना काम किये सिर्फ वेतन के वक्त की सक्रीय होता है | ऐसे लोग कौन है एवं सरकार तथा लोगों ने उस पर क्या कार्यवाही की ? इस पर सब मौन है | पर इस बात से यह नहीं माना जाता की सब कर्मचारी सिर्फ वेतन पर दीखते है | खैर, इससे जो लोग काम करते थे एवं जो कर्मचारी नए जुड़े, उनको 5 साल की गुलामी की जंजीरों में बाँधा गया | कहते है की आदमी के पूर्वज बन्दर है, बन्दर अपनी पूंछ का इस्तमाल कर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते हुए चला जाता है | उसे भी अगर बंधक बना दिया जाये तो वह बन्दर भी नाचने लगता है | कम वेतन और पांच साल की गुलामी के बाद जब उसे फिर से नए सिरे से सुरक्षा में जीवन बसर करना पड़ता है तब तक वह परिवार की जिम्मेदारियों से लड़ गया होता है | गुलामी में जो लोग असुरक्षा के माध्यम में वह काम तो अच्छे करते दिखाई देते है पर काम के प्रति जो समर्पण है वह नहीं आ सकता | मेरा यह मानना है, मेरे देखे हुए एवं भोगे हुए यथार्थ अनुभवों के आधार पर |  
आज-कल यह बार बार सुनने में आता है की, हमें किसी बाहरवाले को यह नहीं बताना है कि, हमारे यहाँ गरीबी, जातिवाद, भुखमरी, नक्सलवाद आदि समस्या होने के बावजूद हमें सब अच्छा ही दिखाना है | यह आज बहुत जोरों से हो रहा है | आज देश कई तरह से बिखरा हुआ है एवं बिखरता जा रहा है | समाज एवं देश जब बिखर रहा हो तब बुद्धिजीवी एवं लेखकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है | उदय प्रकाश जी ने अपना अवार्ड लौटाकर समाज के लिए जो सन्देश दिया था वह आज पुरे देश में गूंज रहा है |
इस समय में युवा सपने खुद युवा के नहीं होते है, युवाओं को इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि वह वही देखे जो वह दिखाना चाहते है | युवाओं के सपने जब युवाओं के नहीं होते है, यानी की अपने नहीं होते | यह जिन्दगी जो मिली है वह भी बिकी हुई लगती है | युवा जो सपने अपने मानकर जी रहे है, यह भ्रम तोड़ने की जरुरत है | क्या आपको नहीं लगता की, निजीकरण से जो युवा पीढ़ी तैयार हो रही है, वह मुखर तो है, पर अपनी सोच से वह मुखरित नहीं हो पाते | व्यवसायलक्षी शिक्षा के साथ स्वयं केन्द्रित शिक्षा ज्यादा घातक है |
जन्तर-मन्तर पर आयेदिन कई सत्याग्रह के पंडाल लगते रहते है | कोई कहता है कि, हमें मजदूर गिना जा रहा है, हम मजदूर नहीं है, नाही मजबूर, हमें मजदूरों से बेहतर वेतन मिलना चाहिए एवं सम्मान भी | मजदूरों से किया जाने वाला व्यवहार बंद करों | निच्चित रूप से मांग सही भी हो फिर भी नजरिया गलत | मजदूर मजदूर है तो क्या वह गुनाह है ? मजदूर सबसे ज्यादा काम करता है, कम वेतन पाता है | यह उनकी मज़बूरी है कि, कम वेतन में उसे काम करना पड़ता है, बिना सुरक्षा के ....| देखा जाए तो सब मजदूर ही है, बिना काम किये आप अपना गुजारा कर सकते है ? शेर जंगल का राजा होने के बावजूद उसे शिकार के लिए निकलना ही पड़ता है |
कुछ बाते स्वच्छता अभियान कि कर ली जाए | सफाई अभियान के अंतर्गत जितने विज्ञापन किये जा रहे है वह होने चाहिए लोगो की जागरूकता के लिए | किन्तु इससे ठेकेदारी प्रथा बंद हुई ? जहाँ पर असुरक्षा में सफाई कर्मचारी काम कर रहे है | यह असुरक्षा बंधुआ मजदूरी एवं कम वेतन के लिए भी है | सरकार जिस तरह से विज्ञापन करते है पर क्या कभी आपने विज्ञापन में उपयोग होने वाले संशाधन सफाईकर्मी के पास देखा है ? बिना सुरक्षा के गटर साफ़ करना, कूड़ा उठाना आम बात है, पर इस आम बात में आज तक कोई सुधार नहीं आया | समाज एवं सरकार की जिम्मेदारी होती है, जो समाज के लिए रोजाना कार्य करते है उन्हें सम्मान के साथ सुरक्षा भी मिलनी चाहिए |
उच्च शिक्षा में फ़िलहाल यह फरमान हुआ है कि, उन छात्रों को फेलोशिप केन्द्रीय विश्य्विद्यालयों में न दी जाए जो नेट पास ना हो | जेनयू और दिल्ली  विश्वविद्यालय के छात्रों ने इसका विरोध किया | नौकरी के लिए नेट अनिवार्य है, किन्तु फेलोशिप के लिए नहीं | फेलोशिप पर हर बार सवाल उठते रहते है, किन्तु यूजीसी ने हालही में यूजीसी में आने वाले अध्यापको एवं आचार्यों आदि को विजिट के लिए मानद भत्ता बढ़ा दिया | अध्यापकीय नौकरी दरम्यान भी यूजीसी माइनर और मेजर रिसर्च के लिए वेतन के साथ अलग से संशोधन के लिए फेलोशिप देती है | इस बात पर किसीने ऊँगली नहीं उठाई | जिन संशोधक छात्रों को फेलोशिप मिलती है, उनपर कई पाबंदिय लगाईं जाती है एवं उसका शोषण भी होता है | संशोधन क्षेत्र में गुलामी आम बात हो गई है, जिससे बात उछलती नहीं एवं डिग्री मिलने के बाद मार्गदर्शक को ज्यादातर छात्र भूल जाते है | हालाँकि वह बाहर से भूल जाते है, अन्दर से नहीं | अन्दर कहीं न कहीं वह शोषण पेड़ बन के उग रहा होता है | वह व्यक्ति पर निर्भर करता है | भविष्य में अगर वह अध्यापक बन जाए तब वह पेड़ फल देता है | व्यक्ति के अनुभव एवं देखने का दृष्टिकोण से यह फल प्रेरित होता है | ज्यादातर यह पेड़ उसी मानसिकता को आगे बढाता है, जो भुगता है | मतलब यह कि, जो उसने भुगता है, वह अन्य को भुगतने पर मजबूर कर देता है | तो दूसरी तरफ कोई अध्यापक जो उसने भुगता है उससे शीख लेते हुए अन्य छात्र उसका भोग न बने यह ध्यान रखते है एवं मानवीय व्यवहार करते है | इस क्षेत्र में जो अन्याय हो रहा है एवं उस पर आप अपने विचार रखना चाहते है तो हम आपका पूरा सहयोग देगे | 
हम प्रतिबद्धता के साथ आपके सहयोग से आगे बढ़ रहे है, हम आप सभी को धन्यवाद करते है | क्रिएटीव मेम्बर कहीं भी रहे वह अपना काम बखूबी करते रहते है, Creative Members प्रतिबद्धता एवं कार्य से धन्यवाद | हमारें सारे लेखक जो हम पर विशवास रखते है एवं पूरा सहयोग करते है, Creative Space की तरफ से सभी लेखकों को धन्यवाद | अपने व्यस्त समय में डॉ. अनिल खावडु और डॉ. भरत भेडा ने अपना योगदान दिया | महेमान संपादक के तौर पर किये कार्य के लिए धन्यवाद | यह अंक आपके सामने रखते हुए, भविष्य में आपके सहयोग की अपेक्षा के साथ....
धन्यवाद |
                                                                                                              
  

डॉ. हरेश परमार
Research Associate
CDLA, New Delhi

Mo. 09408110030 and 09716104937 

Thursday, September 10, 2015

Editor Voice : CSIJ Vol. 03 Issue 04, 2015

Creative Space : International Journal
(Refereed & Peer-Reviewed Intrnational Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
Impact Factor : 0.339

July to Aug., 2015 

Editor Voice

Creative spaeca का प्रस्तुत अंक आपके सामने रखते हुए, आप सभी का धन्यवाद ज्ञापन करते है | आप सभी ने हमें पूरा सहयोग दिया है, ताकि हम आपके सामने नये लेखकों के साथ नये आलेखो का रसास्वाद करा सके | हाल के वर्षो में शिक्षा का जो स्तर हमारे सामने आ रहा है उस पर सोचना दहला देता है |
जहाँ पर हम सरकार का रवैया शिक्षा के क्षेत्र में  देख रहे है, वह निराशाजनक है | सरकारी कॉलेज है, उसमें विद्यार्थी भी है, पर अध्यापक नहीं है, है तो कहीं गिने चुने यानी एक ही होते है | वैसे भी अध्यापकी में अभी भी फिक्स पेमेंट पर रोजगार दिया जाता है, जिसका कोई भविष्य नहीं है, वह अपनी असुरक्षा के चलते विद्यार्थिओं को कैसी शिक्षा देता होगा ? हम सुनते है की, फलानेने आत्महत्या मानसिक रूप से कमजोर होने से या हताहत हने से की है, कभी कभी ऐसा मंजर भी सामने आता है की, परिवार के डर से, कम गुणांकन आने से, रोजगारी न मिलने से आत्महत्या होती रहती है | मानसिक प्रताड़ना का आत्महत्या में कितना हिस्सा है यह आप खुद ही देख सकते हो... फिर भी यह कामना की जाती है की, असुरक्षा में भी अध्यापक अपना कार्य पुरे तन-मन से करें | दूसरा यह भी है की, पढने के अलावा सेमेस्टर सिस्टम में अनेक प्रवृत्ति भी आ जाति है, जिसे अध्यापक लोग सुपरमेन बन के करते रहते है ... फिर भी सरकार जब भी बजट आता है, जब भी वेतन बढ़ोत्तरी की माँग उठती है, सरकार चरमरा जाती है | जहाँ विद्यार्थी जून, जूलाई तक बिना अध्यापक ही पढ़ते है एवं साल पूरा हो जाने पर नये साल में नये अध्यापक का परिचय होता है | यह ऐसा समय है, जहाँ पर आपके श्रम का कोई मूल्य नहीं है, एवं अगर आप वह काम करने के लिए तैयार नहीं हो तो सरकार किसी को भी बैठा दे या फिर किसी को बैठाये ही नहीं एवं विद्यार्थिओं को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है की वह भी जूनियर सुपरमेन है, कुछ न कुछ रास्ता निकाल हिल लेगें | विद्यार्थियो के पास अध्यापक मार्गदर्शन देते है, कई पुस्तकों के रेफ़रन्स भी देते है, पर यह सारा वाकया एक तरह से कथा हो जाता है, क्यों की विद्यार्थी के लिए पुस्तकालय ही नहीं है | उनके पास दो ही रास्ते होते है, अध्यापक जो कहे उसे मान ले, या ना माने | शिक्षा का बजट सालो साल कम ही होता जाता है, योजनायें बढती जाती है ... | निजी क्षेत्र को बढ़ावा सरकार की जिम्मदारी कम करता है, तो जिस सरकार को लोग वोट देते है, वही निजी क्षेत्र में काम करते हुए मानसिक प्रताड़ना के शिकार होते है, वेतन के नाम पर तो कभी श्रम के घंटो में बढ़ावा करके | वोट के अधिकार के वक्त ही भारत में बसे लोग जिम्मेदार नागरिक कहलाते है, जैसे ही वोट दे दिया अब वह रोबोट मां लिया जाता है, जो कहे वह काम करें एवं कभी भी माँग ना करे अपने अधिकारों की | कई निजी संस्थान अपने परिवार एवं अपने समाज को ही रोजगारी देते है पर उपभोक्ता सब लोग होते है | यह समय ऐसा है जहाँ पर अमीर अमीर बनता जाता है, गरीब और गरीब | फिर हम दोष देते है की दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई, हम है की वही के वही है |
हमारी शिक्षानीति का बखान जितना भी किया जाए कम है | हमनें भी हमारी मानसिकता जैसे गिरवी रक्खी हुई है | कभी भी हमने वैज्ञानिक विचारधारा का समर्थन नहीं किया है, हम शोध करते हुए भी कई लोगो को पूज्य मानते है, या मानना पड़ता है | यही भावना एवं गुरु शिष्य परम्परा ने हमें खोखला किया है | गुरु अपने आपको उच्च मानते हुए कभी अपने अधिकार नहीं मांगेगे, शिष्य पूज्य मानते हुए उसी के रास्ते चलने लगता है | यह विसंगता आखिर हमारा दमन करनेवाली सिस्टम को ही बढ़ावा देती है | हमें यह कहते है की हम अभी सक्षम नहीं हुए है, पर जब कोई अमीर आता है, तो सरकार बिना कुछ कहे उन्हें बिना ब्याज के लोन भी दे देती है | हमें कभी कभी हमारे ही स्वास्थ्य के लिए निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है, वहाँ पर वही डॉ. मिल जाते है जो मेनेजमेंट में एडमिशन ले के अपना खुद का बड़ा अस्पताल बना लेते है | सरकार भी उसी को अपनी जमीन देती है और वह उसी सरकार की जमीन पर, सरकार के नागरिकों का इलाज़ करते है | यह विसंगता ही है कि, हमारा समय उलजनो में ही बीत जाता है | फिर भी उम्मीद है, बदलाव आयेगा..... |

                                                                                   डॉ. हरेश परमार

Friday, April 25, 2014

Editor Voice : CSIJ V 2 Issue 1 (2014)

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi Lingual and Multi Disciplinary
ISSN 2347-1689
Jan. to Feb. 2014

Vol 02, Issue 01

Editor Voice
I
 Chief Editor

हमने प्रकृति का दोहन किया है और कर रहे है | शैक्षणिक संस्थानों ने टेक्नोलॉजी को तो अपनाया है, फिर भी कागज का उपयोग सीमित नहीं हुआ है | हम इस भागीदारी में कागज का उपयोग सीमित करने की दिशा में सोच सकते है एवं उसे अमल भी कर सकते है | उच्च अभ्यास में लघुशोध निबंध, प्रबंध, प्रोजेक्ट, असाइनमेंट आदि हम कागज के दोनों तरफ उपयोग कर के ले सकते है; सोचो अगर ऐसा होगा तो एक पर्यावरणीय क्रांति ही आ जायेगी और हम उसके समर्थक कहलायेगें | यह एक विचार है किन्तु विचार को ही तो अमलीजामा पहनाया जाता है !

उच्च अभ्यास में छात्रों को गुलामों की तरह पिसा जाता है और छात्र तीन से पांच साल तक गुलामी के अंधेरों में पीसकर बाहर निकालता है | हम उनसे क्या अपेक्षा रखेगे भला ! फिर भी  गुलामी से ही तो स्वतंत्रता की हवा को पहचाना जाता है, उसी तरह हम डॉ. लगा के घूमते रहते है | हम जिसे देश दुनिया के विद्वानजनों में गिनते है, वह अध्यापक अपने अंडर में कर रहे शोध अध्येता को जाति, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से कमर तोड़ देते है | शोध अध्येता जब मानसिक रूप से प्रताड़ित होता है और घर-परिवार की जिम्मेदारी उसमें भी खुद की जिम्मेदारी को समझे हुए, वह तीन से पांच साल गुलाम बन के रह लेता है | हम आप अपनी शिक्षा के मंदिर कहे जानी वाली युनिवर्सिटी में आये दिन देखते रहते है | हालाँकि सब अध्यापक ऐसे नहीं होते है, मगर फिर भी ऐसे लोग शिक्षा क्षेत्र को अपना अड्डा स्थापित करने की फ़िराक में हैं | वह मानसिक रूप से अपने पर हुए अत्याचारों को दूसरों पर थोपते है, जिससे उसे मानसिक संतुष्टि मिलती है | प्रस्तुत अंक में हमने विद्यार्थियों पर हो रहे अत्याचारों एवं भेदभावों को मद्देनजर रखते हुए शिक्षा की गणमान्य संस्था यूजीसी, नई दिल्ली ने यह बात की गंभीरता को समझते हुए, विधार्थिओं पर होते शोषण को रोकने के लिए कई आदेश युनिवर्सिटी, संस्थाओं एवं कॉलेजों को दिए हैं | कई युनिवर्सिटी ने उसे लागू किया है, तो कुछ ने मात्र यह आदेश है उसे जैसे थे रहने दिया है | विद्यार्थी संगठन हलकी राजनीति में लिप्त है | इसलिए ऐसे आदेश आये-गए हो जाते है | फिर भी कुछ यूनिवर्सिटी को महिला संबंधित हेल्पलाइन शुरू करना ही पड़ा | मगर यह मात्र कागजी करवाई रह गई, तो पत्तों के महल जैसा हो जाएगा | आज की स्थिति में हमें जागृत हो के  शिक्षा के इस अराजक  माहोल को मिटाने की कोशिश मिल के करनी चाहिए | जिससे जाति-लिंग, वर्ण-ज्ञाति, आर्थिक, मानसिक अत्याचार होने बंद हो जाये और हम स्वस्थ मानसिकता के साथ समाज, राज्य, देश के बारे में सही सोच और कार्य कर सके |

हमारे सामने बेकारी और युवाधन का अनुचित उपयोग भी एक गंभीर प्रश्न है | जिसके सामने तथाकथिक राजनीतिक एवं विद्वान मौन हो जाते है | युवा सोच पर नाजीवादी शासन थोप देते है | युवा सोच जो बनती भी नहीं और उसे गलत रूप से खंडनात्मकता की ओर मोड़ा जाता है | सरकारें निजी शैक्षणिक संस्थानों को प्रोस्ताहन दे कर अपनी दूकान चला रहे है; जब चुनाव आता है तो उन्ही पैसों से वोट को ख़रीदा जाता है | चुनाव आयोग ने भी सामान्य जन चुनाव से दूर ही रहे इसलिए चुनाव में खड़े रहने की फ़ीस ही इतनी रक्खी है कि जन साधारण की कमर ही टूट जाए | कई मुद्दे होते है मगर बच्चे जैसे चोकलेट के लिए लड़ाई करते है; वैसे राजनितिक लोग सत्ता के लिए लड़ते दिख जाते है | मेरी यह भाषा असंयमित होते हुए भी वास्तविक है और मुझे लिखना पड रहा है | क्या हम सही में सृजनात्मक या रचनात्मक है ? शायद नहीं ... | कम से कम मैं जीस स्थिति को देख रहा हूँ| वहाँ से तो मैं यही देख रहा हूँ | यह मेरे निजी विचार भी हो सकते है; आपके विचार भी आवकार्य है |

Creative Space : International Journal में लगातार काम करने और हमेशा रचनात्मक रहने पर अनिल खावडू को सहायक संपादक की जगह संपादक बनाया गया है | वह इस जर्नल को आगे ले जाये वही शुभकामनाए | इस तरफ डॉ. भरत भेड़ा भी अपना रचनात्मक सहयोग देते रहे है और लगातार जर्नल के बारे में अपने विचार प्रस्तुत करते रहते है | इस बार के अंक के वह अतिथि संपादक है | इन दोनों ने मेरी जिम्मेदारी कुछ कम की जिससे मैं अपना क्रिएटीव काम कर सका हूँ और आपके सामने यह अंक प्रस्तुत कर पाया हूँ | और भी कई साथी है जिसने हमें यथा समय सही दिशानिर्देश दिए; उनके भी हम आभारी है | इसके साथ ही हमने अपना ब्लॉग आरम्भ कर दिया है जहाँ से आप कभी भी कोई भी जानकारी प्रस्तुत पत्रिका के बारे में ले सकते हो | यह ब्लॉग आप नेट जगत में http://creativespaceip.blogspot.in यहाँ से देख सकते हो | आप ब्लॉग के माध्यम से अपनी बात भी रख सकते हो | आप हमें पत्र या मेल के माध्यम से आपके सुझाव अवश्य भेजें |

प्रधान संपादक
हरेश परमार

Conact : 09408110030